स्वीकृत अभिन्यास की जमीन को बिना संशोधन पहुंच मार्ग बनाने पर उठे सवाल…!
EWS-LIG गणना भी घेरे में जांच समिति ने लिपिकीय त्रुटि वाले जवाब को नकारा….!
बिलासपुर-[जनहित न्यूज़]
बिलासपुर अज्ञेय नगर स्थित बहुमंजिला आवासीय प्रोजेक्ट को लेकर नगर तथा ग्राम निवेश संचालनालय ने बड़ा प्रशासनिक फैसला लेते हुए मेसर्स अनंत रियल्टी की विकास अनुज्ञा निरस्त कर दी है। भागीदार नमन गोयल के माध्यम से जारी विकास अनुज्ञा क्रमांक 1456 को छत्तीसगढ़ भूमि विकास नियम, 1984 के नियम 25 के तहत प्रतिसंहृत किया गया है। इस कार्रवाई के बाद संबंधित प्रोजेक्ट की स्वीकृति प्रक्रिया और उसमें सामने आई कथित विसंगतियां शहर में चर्चा का विषय बन गई हैं।
60 की अनुमति, मानचित्र में 90 प्रकोष्ठ यहीं से बढ़ा विवाद:-
प्रकरण में सबसे गंभीर बिंदु स्वीकृत मानचित्र में प्रकोष्ठों की संख्या को लेकर सामने आया। विकास अनुज्ञा में 15 ब्लॉक, प्रत्येक में चार तल और प्रत्येक तल पर एक प्रकोष्ठ, यानी कुल 60 प्रकोष्ठों का प्रस्ताव था।
लेकिन जांच में स्वीकृत मानचित्र के कुछ हिस्सों में छह तल दर्शाए जाने की बात सामने आई। इस गणना के आधार पर प्रकोष्ठों की संख्या 90 तक पहुंचती है। आदेश के अनुसार इसका सीधा असर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग EWS और निम्न आय वर्ग LIG के लिए निर्धारित प्रकोष्ठों की गणना पर भी पड़ता है।

अनंत रियल्टी की ओर से इसे सलाहकार द्वारा हुई लिपिकीय नंबरिंग त्रुटि बताया गया, लेकिन जांच समिति ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। समिति ने स्पष्ट किया कि स्वीकृति से पहले अभिन्यास पर आवेदक के हस्ताक्षर होते हैं, इसलिए उसमें दर्ज विवरण की जिम्मेदारी से संस्था को अलग नहीं किया जा सकता।
स्वीकृत अभिन्यास की जमीन बनी पहुंच मार्ग, बिना संशोधन इस्तेमाल पर आपत्ति
जांच में दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा उस भूमि से जुड़ा है, जिसका इस्तेमाल प्रोजेक्ट के लिए पहुंच मार्ग के रूप में किया जा रहा था।
जांच समिति के अनुसार यह भूमि पूर्व में स्वीकृत अभिन्यास का हिस्सा थी और कोई सामान्य सार्वजनिक मार्ग नहीं थी। ऐसे में पूर्व स्वीकृत अभिन्यास में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत संशोधन किए बिना इस भूमि को नए विकास में शामिल करना सवालों के घेरे में आया। यही बिंदु विकास अनुज्ञा की शर्तों के उल्लंघन का प्रमुख आधार बना और अंततः संचालनालय ने संस्था के जवाब को संतोषजनक नहीं माना। पहले प्रस्ताव, फिर सुनवाई और आखिरकार निरस्तीकरण मामले में कार्रवाई अचानक नहीं हुई। 25 जून 2025 को जारी विकास अनुज्ञा के संबंध में संयुक्त संचालक, नगर तथा ग्राम निवेश, बिलासपुर द्वारा निरस्तीकरण का प्रस्ताव भेजा गया। इसके बाद संबंधित संस्था को अपना पक्ष और दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया।

31 जुलाई 2026 को सुनवाई के लिए बुलाए जाने पर संस्था की ओर से 15 दिन का अतिरिक्त समय मांगा गया। इसके बाद नमन गोयल ने 7 अगस्त को उपस्थित होकर जवाब और दस्तावेज प्रस्तुत किए। जांच समिति ने उपलब्ध जवाबों एवं दस्तावेजों का परीक्षण किया और 24 अगस्त को प्रकरण की पड़ताल की गई। परीक्षण के बाद संचालनालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि प्रस्तुत स्पष्टीकरण विकास अनुज्ञा की शर्तों और सामने आई विसंगतियों को संतोषजनक ढंग से स्पष्ट नहीं करता। इसके बाद विकास अनुज्ञा निरस्त करने का अंतिम आदेश जारी किया गया।
आर्किटेक्ट से लेकर पार्किंग और ओपन स्पेस तक उठे सवाल:-
इधर, जांच प्रक्रिया से जुड़े उच्च पदस्थ आधिकारिक सूत्रों के अनुसार प्रोजेक्ट की पड़ताल के दौरान केवल प्रकोष्ठों की संख्या और पहुंच मार्ग ही नहीं, बल्कि आर्किटेक्ट की वैधता, EWS/LIG दायित्वों से जुड़े शपथ-पत्र, पहुंच मार्ग की चौड़ाई, पार्किंग तथा ओपन स्पेस जैसे कई पहलुओं पर भी सवाल उठे। सूत्रों ने स्वीकृतियां प्राप्त करने के दौरान कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को कथित रूप से छिपाने अथवा गलत ढंग से प्रस्तुत किए जाने का दावा भी किया है।
हालांकि, महत्वपूर्ण बात यह है कि ये सभी बिंदु तीन पृष्ठ के अंतिम निरस्तीकरण अब कई विभागों की निगाहें, कार्रवाई के लिए भेजी गई आदेश की प्रतियां विकास अनुज्ञा निरस्त करने के अंतिम आदेश की प्रतियां संबंधित विभागों और अधिकारियों को सूचना एवं आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजी गई हैं। इनमें आवास एवं पर्यावरण विभाग, बिलासपुर कलेक्टर, नगर निगम आयुक्त, छत्तीसगढ़ भू-संपदा विनियामक प्राधिकरण (CG RERA), अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व), संयुक्त संचालक नगर तथा ग्राम निवेश और उप पंजीयक सहित संबंधित अधिकारी शामिल हैं।
इससे अब मामला केवल विकास अनुज्ञा निरस्त होने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि संबंधित विभागों के स्तर पर प्रोजेक्ट से जुड़े अन्य पहलुओं की जांच और नियमानुसार कार्रवाई की संभावनाएं भी महत्वपूर्ण हो गई हैं।

टाउन प्लानिंग के आदेश ने खड़े किए कई बड़े सवाल
अनंत रियल्टी की विकास अनुज्ञा का:- निरस्तीकरण बिलासपुर में भवन एवं भूमि विकास से जुड़े मामलों में प्रशासनिक निगरानी के लिहाज से महत्वपूर्ण कार्रवाई मानी जा रही है। खासतौर पर स्वीकृत अभिन्यास में बदलाव, पहुंच मार्ग, स्वीकृत प्रकोष्ठों की संख्या तथा EWS-LIG दायित्वों जैसे विषयों पर यह मामला भविष्य में भी नजीर बन सकता है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब अनुमति 60 प्रकोष्ठों की थी, तो स्वीकृत मानचित्र के कुछ हिस्सों में छह तल दर्शाए जाने से संख्या 90 तक कैसे पहुंची…? और पूर्व स्वीकृत अभिन्यास की भूमि को आवश्यक संशोधन के बिना पहुंच मार्ग के रूप में इस्तेमाल करने की स्थिति कैसे बनी…?
नगर तथा ग्राम निवेश संचालनालय की कार्रवाई ने इन सवालों पर प्रशासनिक शिकंजा कस दिया है। सोचने वाली बात ये है कि आखिर किसकी शय पर तथा इसमें किसका खेला है।
अब संबंधित विभागों की अगली कार्रवाई पर सबकी नजर टिकी है।

