सकरी ऐ ई श्रीमान चौबे जी को पता ही नही की बिजली क्यो गुल है…?
ट्रांसफार्मर जलते रहे और अफसर देते रहे सिर्फ ‘हूं-हूं’ कर जवाब!
बिलासपुर-[जनहित न्यूज़]
एक तरफ छत्तीसगढ़ सरकार “सुशासन तिहार” के नाम पर विकास और बेहतर व्यवस्था के दावे कर रही है, वहीं दूसरी तरफ बिलासपुर से लगे ग्राम पंचायत चिचिरदा का आवास पारा पिछले चार दिनों से अंधेरे में डूबा हुआ है। हालात इतने बदतर हैं कि गांव के लोग अब पूछने लगे हैं, क्या यही है सरकार का सुशासन, जहां लोगों को बिजली जैसी बुनियादी सुविधा के लिए भी तरसना पड़े?
मंगलवार शाम आई आंधी-तूफान के बाद से गांव की बिजली व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। शुक्रवार शाम तक भी न तो स्थायी सुधार हो पाया और न ही बिजली विभाग की ओर से कोई ठोस पहल नजर आई। ग्रामीणों के मुताबिक कभी-कभार कुछ मिनट के लिए बिजली आती है और फिर अचानक गुल हो जाती है।

कई जगह तारों और ट्रांसफार्मर में चिंगारी और आग लगने जैसी घटनाएं सामने आई हैं, जिससे लोगों में भय और आक्रोश दोनों बढ़ गया है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बिजली उत्पादन करने वाले राज्य में ही लोग अंधेरे में रात गुजारने को मजबूर हैं। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है, गर्मी में बुजुर्गों और महिलाओं का हाल बेहाल है, वहीं पेयजल और रोजमर्रा के कामकाज भी ठप पड़ चुके हैं।

ग्रामीणों ने बिजली विभाग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि विभाग द्वारा घटिया गुणवत्ता के तार और ट्रांसफार्मर लगाए जा रहे हैं, जिसके कारण बार-बार फाल्ट और ट्रांसफार्मर जलने की घटनाएं हो रही हैं। लोगों का कहना है कि शिकायत के बावजूद न अधिकारी मौके पर पहुंच रहे हैं और न ही फोन उठाने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

सकरी विद्युत विभाग के एई श्री चौबे पर भी ग्रामीणों ने नाराजगी जताई। आरोप है कि फोन लगाने पर केवल “हूं-हूं” कहकर जवाब दिया जाता है और बाद में “पता करके बताता हूं” कहकर मामला टाल दिया जाता है। लेकिन आखिर फाल्ट कहां है, सुधार कार्य कब तक पूरा होगा और बिजली कब सुचारू होगी, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।

ग्रामीणों का कहना है कि यह सिर्फ लापरवाही नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता है। अगर एक छोटे से गांव की बिजली व्यवस्था चार दिनों तक बहाल नहीं हो पा रही, तो सरकार के बड़े-बड़े दावे सिर्फ कागजी साबित हो रहे हैं।
अब गांव में आक्रोश बढ़ता जा रहा है।
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द बिजली व्यवस्था दुरुस्त नहीं की गई, तो वे उग्र आंदोलन करने को मजबूर होंगे। चिचिरदा की यह तस्वीर सिर्फ एक गांव की समस्या नहीं, बल्कि उस बदहाल व्यवस्था की कहानी है जहां जनता अंधेरे में है और जिम्मेदार अधिकारी बेखबर।

