ओपी चौधरी ने सावित्री बाई बाई के योगदान से नई पीढ़ी को कराया अवगत
03 दिसंबर 2022
रायगढ़-{जनहित न्यूज़}
रायगढ़ प्रदेश भाजपा महामंत्री ओपी चौधरी ने देश में पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रधानाचार्या और पहले किसान स्कूल की संस्थापिका सावित्री बाई फुले के स्त्युत्य योगदान से युवा पीढ़ी को अवगत कराते हुए कहा कि देश में सामाजिक सुधार आंदोलन में उनकी भूमिका विस्मृत नही की जा सकती l महिलाओं और दलित जातियों को शिक्षित करने के प्रयासों के लिए उन्हें योगदान को सदैव याद किया जाता रहेगा I सावित्री बाई का संपूर्ण जीवन एक मिशन की तरह रहा l विधवा विवाह करवाने की पहल की l इसके साथ साथ छुआछूत मिटाने , महिलाओं को शोषण की दासता से मुक्ति दिलाने व दलित महिलाओं को शिक्षित बनाने के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन होम कर दिया l गुलाम भारत में उन्होंने महिलाओ को सामाजिक बुराई की जंजीरों से मुक्त दिलाने के लिए प्रयास किया l वर्ष 1848 के दौरान महाराष्ट्र के पुणे में अपने पति के साथ मिलकर विभिन्न जातियों की नौ छात्राओं के साथ उन्होंने एक विद्यालय की स्थापना की। एक वर्ष में पाँच नये विद्यालय खोलने में सफल हुए। तत्कालीन सरकार ने इनके योगदान को देख सम्मानित भी किया। ओपी चौधरी ने बताया कि एक वो दौर था जब परंपराओं को बेड़ियों से जकड़ी अंधविश्वास के घूंघट में कैद महिलाओ को घर की चाहर दिवारी में कैद रहती थी l उस दौर में बतौर महिला प्रिंसिपल सावित्री बाई फुले के लिए बालिका विद्यालय चलाना कितना मुश्किल रहा होगा, इसकी कल्पना शायद आज भी नहीं की जा सकती। ये वो दौर था जब लड़कियों की शिक्षा पर सामाजिक पाबंदी लागू थी l सावित्रीबाई फुले उस दौर में स्वय शिक्षा हासिल की साथ में दूसरी लड़कियों के पढ़ने के लिए प्रेरित करते हुए उनके पढ़ाई की व्यवस्था की l सावित्री बाई फुले जब स्कूल जाती थी तब लोग पत्थर मारते हुए उन पर गंदगी तक फेंकते थे ताकि उनका मनोबल तोड़ा जा सके l लगभग एक सौ पचहत्तर वर्ष पहले बालिकाओं के लिये जब स्कूल खोलना पाप माना जाता था कितनी सामाजिक मुश्किलों का सामना करते हुए सावित्री बाई फुले ने देश में पहला बालिका विद्यालय खोला l सच मायने में बतौर महानायिका सावित्रीबाई ने यह साबित किया कि राह कितनी भी कठिन हो आत्मविश्वास के जरिए लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है l उन्होंने सर्वहारा वर्ग के लिए काम किया l उन्नीसवीं सदी में सावित्रीबाई ने छुआ-छूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह और विधवा विवाह जैसी कुरीतियों के विरुद्ध कार्य किया l उनके जीवन से जुड़े संस्मरण का उल्लेख करते हुए ओपी चौधरी ने बताया कि आत्महत्या के लिए जाती हुई एक विधवा ब्राह्मण महिला काशीबाई की अपने घर में डिलीवरी करवा कर उसके बच्चे यशंवत को अपने दत्तक पुत्र के रूप में गोद लिया। दत्तक पुत्र यशवंत राव को पाल-पोसकर उन्होंने उसे डॉक्टर बनाया। सावित्रीबाई ने पति के साथ मिलकर 1873 को सत्यशोधक समाज की स्थापना की। वही से विधवा विवाह की परंपरा भी शुरू की गई lवे एक कवयित्री भी थीं। उन्हें ‘मराठी की आदि कवयित्री’ के रूप में भी जाना जाता था।कविताओं और लेखों में सामाजिक चेतना व समाज सुधार की झलक दिखाई देती थी l
सावित्रीबाई फुले देश की पहली महिला शिक्षिका होने के साथ-साथ उनका पूरा जीवन समाज के वंचित तबके खासकर स्त्री और दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष के लिए व्यतीत हुआ l

