लोकल ओबीसी समुदाय को नजर अंदाज करने से सुलग रही अंदरूनी कलह-◆
बिलासपुर-[जनहित न्यूज़]
:मनोज राज: छत्तीसगढ़ में नगर निगम चुनाव की सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं, और महापौर पद को लेकर दोनों प्रमुख राजनीतिक दल कांग्रेस और भाजपा अपनी रणनीतियां तय करने में जुट गए हैं। इस बार महापौर की सीट को ओबीसी आरक्षित घोषित किया गया है, जिससे दोनों दलों के लिए इस वर्ग के समर्थन को साधना बेहद अहम हो गया है।
कांग्रेस के संभावित उम्मीदवार प्रमोद नायक

कांग्रेस की ओर से प्रमोद नायक का नाम लगभग तय माना जा रहा है। श्री नायक पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं और उनकी छवि एक शांत स्वभाव, मिलनसार और सामंजस्य स्थापित करने वाले नेता की है। उनके बारे में कहा जाता है कि वे पार्टी के हर वर्ग के कार्यकर्ताओं के साथ सहजता से काम करते हैं।
प्रमोद नायक की कार्यशैली और उनके व्यवहार के चलते पार्टी में उनका मजबूत जनाधार है। कांग्रेस के रणनीतिकारों को भरोसा है कि नायक न केवल पार्टी के पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ताओं को एकजुट रखेंगे, बल्कि ओबीसी वर्ग का भी समर्थन हासिल करने में कामयाब होंगे। कांग्रेस ने नायक के अनुभव और उनकी छवि को ध्यान में रखते हुए उन्हें इस पद के लिए सबसे उपयुक्त उम्मीदवार के रूप में देखा है।
भाजपा के लिए चुनौती बनी ओबीसी सीट

वहीं, भाजपा में उम्मीदवार को लेकर विवाद की स्थिति है। पार्टी में चर्चा है कि पूर्व मंत्री और विधायक अमर अग्रवाल के करीबी अशोक विधानी की पत्नी को महापौर पद के लिए उम्मीदवार बनाया जा सकता है। हालांकि, इस पर भाजपा के अंदरूनी हलकों में असंतोष दिखाई दे रहा है।
इस असंतोष का कारण यह है कि अशोक विधानी की पत्नी दक्षिण भारतीय मूल की हैं, हालांकि वे ओबीसी वर्ग में आती हैं। भाजपा के कई स्थानीय ओबीसी कार्यकर्ता इस फैसले से नाखुश हैं। उनका मानना है कि पार्टी ने छत्तीसगढ़ के स्थानीय ओबीसी नेताओं को दरकिनार कर बाहरी पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार को तरजीह दी है।
स्थानीय कार्यकर्ताओं का असंतोष
भाजपा के स्थानीय कार्यकर्ताओं में यह भावना गहराई से घर कर रही है कि पार्टी ने वर्षों से समर्पित ओबीसी नेताओं को नज़रअंदाज किया है। एक वर्ग का कहना है कि भाजपा ने यदि छत्तीसगढ़ के स्थानीय ओबीसी समुदाय से कोई उम्मीदवार नहीं चुना, तो यह फैसला चुनाव में भारी नुकसान भरा हो सकता है।
कुछ कार्यकर्ताओं ने दबी ज़ुबान से यहां तक कहा है कि यदि भाजपा ने अशोक विधानी की पत्नी को महापौर पद के लिए उम्मीदवार बनाया, तो स्थानीय ओबीसी समुदाय का समर्थन खोने का खतरा बढ़ सकता है। यह सवाल खड़ा हो रहा है कि बिलासपुर जैसे बड़े जिले में भाजपा को क्या कोई ऐसा स्थानीय ओबीसी नेता नहीं मिला, जो इस पद के लिए उपयुक्त हो?
चुनाव पर असर
यह स्पष्ट है कि इस चुनाव में ओबीसी वर्ग की भूमिका बेहद अहम रहने वाली है। कांग्रेस जहां प्रमोद नायक के जरिए ओबीसी समुदाय को साधने की कोशिश कर रही है, वहीं भाजपा अपने संभावित उम्मीदवार को लेकर ही अंदरूनी विवादों में उलझी नजर आ रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा को अपने निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए, क्योंकि स्थानीय ओबीसी समुदाय के समर्थन के बिना पार्टी का प्रदर्शन कमजोर हो सकता है। दूसरी ओर, कांग्रेस अपने मजबूत उम्मीदवार और सधी हुई रणनीति के सहारे भाजपा को कड़ी चुनौती देने की तैयारी में है।
आने वाले दिनों का इंतजार
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि दोनों पार्टियां अपने उम्मीदवारों की घोषणा कब और कैसे करती हैं। क्या भाजपा अपने संभावित उम्मीदवार के नाम को लेकर हो रहे विवाद को सुलझा पाएगी? या कांग्रेस अपने रणनीतिक दांव से भाजपा को पीछे छोड़ने में कामयाब होगी? यह चुनाव केवल महापौर पद की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह ओबीसी वर्ग के राजनीतिक महत्व को भी परिभाषित करेगा।
निष्कर्ष:
महापौर पद के लिए हो रही इस दावेदारी ने साफ कर दिया है कि छत्तीसगढ़ की राजनीति में ओबीसी वर्ग की भूमिका निर्णायक है। इस चुनाव का परिणाम न केवल राजनीतिक दलों के लिए सबक होगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि स्थानीय नेतृत्व को कितनी प्राथमिकता दी जाती है।

