बहते आँसू के बीच मासूम आवाज़ ने कहा…सर ने पाइप से मारा और बोले सीढ़ी से गिरा बोल देना…!
बिलासपुर-[जनहित न्यूज] तखतपुर के विज़डम द ग्लोबल स्कूल में बच्चों के साथ हुई पिटाई की घटना ने न केवल स्थानीय अभिभावकों को झकझोर दिया है, बल्कि निजी स्कूलों की जवाबदेही पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
यह मामला अब केवल तीन बच्चों की पिटाई का नहीं रहा, बल्कि स्कूल परिसर में बाल सुरक्षा, कानून, और संस्थानिक ज़िम्मेदारी की ऐतिहासिक जाँच का विषय बन गया है।
घटना का खुलासा चुप्पी के भीतर छिपा दर्द:-
तीन मासूम छात्र वेदांत अग्रवाल, आयाश अग्रवाल और एक अन्य बच्चे के शरीर पर पाइप से पिटाई के निशान पाए गए।
घटना का खुलासा तब हुआ जब कपड़े बदलते वक्त दादी ने बच्चे के पैरों और पीठ पर गहरे लाल-नीले चोटों के निशान देखे। बच्चों ने डर के कारण घर पर सच बताने की हिम्मत तक नहीं की। उनकी आँखों से बहते आँसू और मासूम आवाज़ में यह कहना कि, टीचर ने पाइप से मारा, और बोले सीढ़ी से गिरा बोल देना…
ने पूरे इलाके को हिला कर रख दिया।
अभिभावकों की पीड़ा यह गलती नहीं अपराध है।
अभिभावकों का कहना है कि उनके बच्चों को कई दिनों से पाइप से मारा जा रहा था। वेदांत के पिता नवीन अग्रवाल के मुताबिक बच्चे के शरीर पर चोटें देखकर दिल कांप गया। यह गलती नहीं, हिंसा है।
आयाश के पिता अनिल अग्रवाल का आरोप है कि टीचर ने मारपीट के बाद बच्चों को झूठ बोलने के लिए दबाव बनाया जो आपराधिक मानसिकता का स्पष्ट संकेत है। स्कूल प्रबंधन की भूमिका माफी मांग लो और मामला खत्म अभिभावक जब शिकायत लेकर स्कूल पहुंचे तो प्रबंधन ने पूरे प्रकरण को छोटी सी गलती कहकर टालने की कोशिश की।
डायरेक्टर और प्रिंसिपल ने मौखिक आश्वासन तो दिया, पर किसी भी कार्रवाई का लिखित आदेश देने से साफ इनकार कर दिया।
अभिभावकों का कहना है …
टीचर से माफी मंगवाकर स्कूल प्रबंधन ने कहा कि अब आगे जो करना हो कर लीजिए।
यह कथन स्कूल की जिम्मेदारी से भागने का स्पष्ट उदाहरण है।
कानूनी और ऐतिहासिक संदर्भ जिम्मेदारी से बचना नहीं, निभाना होता है
यह घटना एक ऐतिहासिक सवाल उठाती है…!
स्कूल परिसर में बच्चों के साथ होने वाली किसी भी दुर्घटना या हिंसा की पूरी जिम्मेदारी संस्थान की होती है।
इसका अर्थ…
बच्चों की सुरक्षा केवल टीचर की नहीं, बल्कि पूरे संस्थान की सामूहिक जिम्मेदारी है।
शिक्षा के अधिकार अधिनियम (RTE) और बाल संरक्षण कानून के अंतर्गत स्कूल किसी भी प्रकार की हिंसा पर लिखित कार्रवाई, FIR और जांच को सुनिश्चित करने के लिए बाध्य हैं।
ऐसी घटनाओं को माफी और आश्वासन में दबाना कानूनी रूप से अपराध माना जाता है।
यह मामला केवल एक घटना नहीं…
यह सवाल है…?
निजी स्कूलों की ज़िम्मेदारी कहाँ है…?
बच्चों की सुरक्षा का मापदंड कौन तय करेगा…?
अभिभावकों के आक्रोश का न्याय कौन करेगा…?
बच्चे देश का भविष्य होते हैं, और स्कूल उनका मंदिर।
यदि इसी मंदिर में हिंसा और डर का माहौल होगा, तो यह समाज के इतिहास में काला अध्याय ही लिखा जाएगा।

