55 यज्ञोपवीत 6 आदर्श विवाह और 100 कर्णवेधन का एक साथ हुआ भव्य आयोजन…
रायपुर-{जनहित न्यूज़}
रायपुर सनातन संस्कृति और भारतीय परंपराओं के वैश्विक केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित 317 वर्ष प्राचीन पूज्य शदाणी दरबार तीर्थ में 25 जनवरी रविवार को धार्मिक आस्था, सामाजिक सुधार और वैदिक परंपराओं का अनुपम संगम देखने को मिला।

वर्तमान पीठाधीश संत डॉ. युधिष्ठिर लाल के पावन आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन में यहां 55 बटुकों के सामूहिक यज्ञोपवीत संस्कार, 6 आदर्श सामूहिक विवाह तथा 100 बालकों का कर्णवेधन संस्कार भव्यता के साथ संपन्न हुआ।

यह आयोजन लगातार 21वें वर्ष सफलतापूर्वक संपन्न हुआ, जिसने दरबार तीर्थ की गौरवशाली परंपरा को और सुदृढ़ किया। इस विराट आयोजन में स्वामी सारंग ग्लोबल पीस फाउंडेशन के संस्थापक स्वामी डॉ. सारंग मोहल्ले , सांसद बृजमोहन अग्रवाल , उत्तर रायपुर विधायक पुरंदर मिश्रा सहित समाज के अनेक गणमान्य अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति रही। विधायक श्री मिश्र के साथ नागपुर से विजय कुमार, अमरावती से राजेश साधवानी , नानिकराम साहित्या, संदीप कंवल सहित विशिष्ट नागरिकों ने भी अपने बच्चों का कर्णवेधन संस्कार करवाया।

कार्यक्रम के दौरान दरबार तीर्थ के मंगल भवन में आयोजित हनुमंत गैलरी चित्रकला प्रदर्शनी का उद्घाटन टोप लाल वर्मा (प्रांत संघ चालक, RSS), स्वामी डॉ. सारंग मोहल्ले एवं पूज्य संत श्री के करकमलों से किया गया, जिसने श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक कला की अनुपम झलक प्रदान की।

धार्मिक विद्वानों ने यज्ञोपवीत संस्कार के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह जीवन का दूसरा जन्म माना जाता है,पहला माता के गर्भ से और दूसरा धर्म एवं ज्ञान के मार्ग पर प्रवेश का प्रतीक है।

उपनयन से बालकों को यज्ञ, हवन, पूजा-पाठ जैसे धार्मिक कर्मों का अधिकार प्राप्त होता है तथा शास्त्रों के अनुसार इससे आयु, बल और बुद्धि में वृद्धि होती है। इसके तीन सूत्र ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक माने जाते हैं, जो कर्तव्य, संयम और सदाचार का संदेश देते हैं।

वहीं आदर्श सामूहिक विवाह कार्यक्रम ने सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध सशक्त संदेश दिया। बिना दहेज, बिना आडंबर और पूर्ण वैदिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न इन विवाहों ने समाज को सादगी और समरसता की प्रेरणा दी।

कर्णवेधन संस्कार, जिसे सनातन धर्म का नवम संस्कार माना जाता है, के विषय में विद्वानों ने बताया कि इससे श्रवण शक्ति, मेधा और स्वास्थ्य में वृद्धि होती है तथा इसे सामान्यत यज्ञोपवीत से पूर्व कराया जाता है।

मकर संक्रांति के पश्चात सूर्य के उत्तरायण काल में संपन्न हुए इन सभी संस्कारों को विशेष फलदायी बताते हुए संतजनों ने कहा कि इस काल में किए गए धार्मिक अनुष्ठानों से देवों और गुरुओं का आशीर्वाद सहज रूप से प्राप्त होता है, जिससे जीवन सुखी और समृद्ध बनता है।

शदाणी दरबार तीर्थ में आयोजित यह महायज्ञ और संस्कार महोत्सव न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक चेतना का सशक्त संदेश भी पूरे देश को दे

