1 हजार का डीजल और 500 पेट्रोल की सीमा किसके आदेश पर की तय …?
जनता किसान स्कूल अस्पताल और संस्थान सब बेहाल…!
बिलासपुर-{जनहित न्यूज़}
बिलासपुर न्यायधानी इन दिनों डीजल संकट की मार झेल रही है। शहर से लेकर आउटर क्षेत्र तक हालात ऐसे बन गए हैं कि कई पेट्रोल पंपों पर डीजल पूरी तरह खत्म हो चुका है, जबकि जहां डीजल उपलब्ध है वहां संचालक अपनी मनमर्जी से केवल 1 हजार से 15 सौ तक का डीजल देने का नियम लागू कर रहे हैं।
यदि किसी को बिलासपुर से रायपुर ही जाना हो तो 3 हजार का डीजल लगता है और इन दिनों पेट्रोल पंप पर सिर्फ 1 हजार से 15 सौ का ही डीज़ल दिया जा रहा है ऐसे में भला व्यक्ति कैसे करे…?
हैरानी की बात यह है कि प्रशासन अथवा ऑयल कंपनियों की ओर से ऐसी कोई आधिकारिक सीमा तय नहीं की गई है, बावजूद इसके पंप संचालक खुलेआम अपनी शर्तों पर डीजल वितरण कर रहे हैं।
इस अव्यवस्था का सबसे बड़ा खामियाजा आम जनता, किसान, ट्रांसपोर्टर और रोजाना डीजल पर निर्भर छोटे व्यवसाय भुगत रहे हैं। किसान ट्रैक्टर और पंप चलाने के लिए डीजल के लिए दर-दर भटक रहे हैं। वहीं मालवाहक वाहन चालकों की परेशानी अलग बढ़ गई है।

प्रशासन का आदेश बना नई परेशानी की वजह डीजल और पेट्रोल की कालाबाजारी रोकने के उद्देश्य से प्रशासन द्वारा जरीकेन और डिब्बों में पेट्रोल-डीजल नहीं देने का आदेश जारी किया गया। उद्देश्य भले ही सही हो, लेकिन बिना वैकल्पिक व्यवस्था के लागू किया गया यह निर्णय अब कई बड़े संस्थानों के लिए मुसीबत बनता जा रहा है।
शहर के स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, मॉल, शोरूम और बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में भारी क्षमता के जनरेटर लगे हुए हैं, जो आपात स्थिति में बिजली व्यवस्था संभालते हैं। सवाल यह उठ रहा है कि अब ये संस्थान डीजल कैसे प्राप्त करेंगे? क्या बड़े-बड़े जनरेटर को पेट्रोल पंप तक ले जाकर डीजल भरवाया जाएगा?
स्थिति और भी गंभीर तब हो सकती है जब किसी अस्पताल या शैक्षणिक संस्था में बिजली बाधित हो जाए और जनरेटर में डीजल उपलब्ध न हो। ऐसे में प्रशासनिक आदेश की व्यवहारिकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

गाइडलाइन नहीं, सिर्फ फरमान!
शहर के कई संस्थानों का कहना है कि वे शासन की अनुमति लेकर जनरेटर संचालित करते हैं, ऐसे में उनके लिए अलग व्यवस्था और स्पष्ट गाइडलाइन बनाई जानी चाहिए थी। बिना योजना के लागू किए गए इस आदेश ने वैध संस्थानों को भी संकट में डाल दिया है।

लोगों का कहना है कि यदि प्रशासन कालाबाजारी रोकना चाहता है तो इसके लिए सत्यापन आधारित अनुमति प्रणाली लागू की जा सकती है, जिसमें स्कूल, अस्पताल और पंजीकृत संस्थानों को सीमित मात्रा में जरीकेन के माध्यम से डीजल लेने की छूट दी जाए।
जनता पूछ रही आखिर जिम्मेदार कौन?
एक तरफ ऑयल कंपनियों और पेट्रोल पंप संचालकों के बीच विवाद, दूसरी तरफ प्रशासनिक आदेश और तीसरी ओर मनमानी वितरण व्यवस्था… इन सबके बीच पिस रही है सिर्फ आम जनता।
अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस गंभीर समस्या को केवल आदेशों तक सीमित रखता है या फिर जमीनी हकीकत को समझते हुए तत्काल प्रभाव से नई गाइडलाइन जारी कर राहत देने का काम करता है।

